भारत में खेल सिर्फ पदक जीतने या प्रतियोगिता में आगे निकलने का नाम नहीं है। खेलों से अनुशासन, मेहनत, आत्मविश्वास और टीम भावना जैसी कई चीजें जुड़ी हैं। क्रिकेट के मैदान से लेकर गांव की गलियों में खेले जाने वाले खेलों तक, खेल भारतीय जीवन का लंबे समय से हिस्सा रहे हैं। अब धीरे-धीरे खेल देश के विकास की कहानी का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनते जा रहे हैं।
सबसे बड़ा बदलाव खेलों के आसपास तैयार हो रही व्यवस्था में दिखाई देता है।
पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने ऐसी कई योजनाएं शुरू की हैं, जिनका उद्देश्य खेलों को बड़े शहरों और कुछ लोकप्रिय खेलों तक सीमित रखने के बजाय देश के छोटे शहरों, कस्बों और गांवों तक पहुंचाना है। इनमें खेलो इंडिया एक महत्वपूर्ण पहल है। इसके तहत खेल सुविधाओं को बेहतर बनाने, नई प्रतिभाओं की पहचान करने, प्रशिक्षण देने, प्रतियोगिताएं आयोजित करने और खिलाड़ियों को आगे बढ़ने के अवसर देने पर जोर दिया जा रहा है।
2026 में इस दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया गया। केंद्रीय बजट में खेलो इंडिया मिशन की घोषणा की गई। इसी के साथ युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय के लिए 2026–27 में ₹4,479.88 करोड़ का प्रावधान किया गया, जो मंत्रालय को अब तक मिला सबसे बड़ा बजट आवंटन बताया गया है। खेल सामग्री के निर्माण को बढ़ावा देने के लिए ₹500 करोड़ का प्रावधान भी किया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि खेलों को केवल मैदान तक सीमित न रखकर रोजगार और कारोबार से भी जोड़ने की कोशिश हो रही है।
जुलाई 2026 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने संशोधित खेलो इंडिया योजना और राष्ट्रीय खेल महासंघों को दी जाने वाली सहायता में बढ़ोतरी को मंजूरी दी। 2026–27 से 2030–31 तक इन पहलों के लिए कुल ₹36,441 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इसमें जिला स्तर पर प्रतिभाओं की पहचान, खेल सुविधाओं का विकास, प्रशिक्षण, खेल विज्ञान और तकनीक जैसे क्षेत्रों पर खास ध्यान दिया गया है।
भारत जैसे बड़े और विविध देश में यह काम आसान नहीं है। यहां प्रतिभा सिर्फ महानगरों में नहीं मिलती। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में भी ऐसे कई बच्चे और युवा हैं, जिनमें किसी खेल में आगे बढ़ने की क्षमता हो सकती है। लेकिन सही मैदान, अच्छे उपकरण, प्रशिक्षित कोच और नियमित प्रतियोगिताओं का अवसर न मिले तो उनकी प्रतिभा सामने आने से पहले ही दब सकती है।
इसी वजह से जमीनी स्तर पर खेल सुविधाओं और अवसरों को बढ़ाना महत्वपूर्ण है। सरकार का सहयोग भी केवल खेलो इंडिया तक सीमित नहीं है। राष्ट्रीय खेल विकास कोष (NSDF) के माध्यम से विशेष प्रशिक्षण, खेल उपकरण, बुनियादी ढांचे, शोध और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुभव हासिल करने जैसी जरूरतों के लिए भी सहायता दी जाती है।
हालांकि, भारत में खेलों की प्रगति को केवल पदकों की संख्या या सरकार द्वारा खर्च किए गए पैसे से नहीं समझा जा सकता। एक मजबूत खेल संस्कृति तब बनती है, जब बच्चों को स्कूल और आसपास खेलने की अच्छी जगह मिले, प्रशिक्षित कोच उपलब्ध हों और खेल को केवल समय बिताने का साधन नहीं, बल्कि एक संभावित करियर के रूप में भी देखा जाए।
यही भारत के सामने सबसे बड़ी संभावना है, ऐसी व्यवस्था तैयार करना जिसमें किसी बच्चे की प्रतिभा सिर्फ इसलिए न छूट जाए क्योंकि उसे सही समय पर सही अवसर नहीं मिला। प्रतिभा की पहचान जल्दी हो, उसे अच्छा प्रशिक्षण मिले और आगे बढ़ने के लिए लगातार समर्थन मिलता रहे।
भारत ने इस दिशा में कदम बढ़ाना शुरू कर दिया है। अब चुनौती यह है कि इन योजनाओं और निवेश का असर देश के हर हिस्से तक कितनी अच्छी तरह पहुंचता है।
आखिरकार, भारत के लिए खेलों की असली सफलता सिर्फ अगला पदक जीतने में नहीं होगी। सफलता तब होगी, जब देश में ऐसी खेल संस्कृति तैयार हो, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए लगातार नए खिलाड़ियों को आगे बढ़ने का मौका दे।